(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

Aadiparv (Mahabharat) - आदिपर्व (महाभारत)


॥ श्रीः ॥
1.169. अध्यायः 169
Mahabharata - Adi Parva - Chapter Topics
घटोत्कचोत्पत्तिः॥ 1 ॥ स्मृतिमात्रादागच्छाव इत्युक्त्वा हिडिम्बाघटोत्कचयोर्गमनम्॥ 2 ॥
Mahabharata - Adi Parva - Chapter Text

वैशम्पायन उवाच। 1-169-0x(991)(7718)
गते भगवति व्यासे पाण्डवा विगतज्वराः।
ऊषुस्तत्र च षण्मासान्वटवृक्षे यथासुखम्॥ 1-169-1(7719)
शाकमूलफलाहारास्तपः कुर्वन्ति पाण्डवाः।
अनुज्ञाता महाराज ततः कमलपालिका॥ 1-169-2(7720)
रमयन्ती सदा भीमं तत्रतत्र मनोजवा।
दिव्याभरणवस्त्रा हि दिव्यस्रगनुलेपना॥ 1-169-3(7721)
एवं भ्रातॄन्सप्त मासान्हिडिम्बाऽवासयद्वने।
पाण्डवान्भीमसेनार्थे राक्षसी कामरूपिणी॥ 1-169-4(7722)
सुखं स विहरन्भीमस्तत्कालं पर्यणामयत्।
ततोऽलभत सा गर्भं राक्षसी कामरूपिणी॥ 1-169-5(7723)
अतृप्ता भीमसेनेन सप्तमासोपसंगता।'
प्रजज्ञे राक्षसी पुत्रं भीमसेनान्महाबलात्॥ 1-169-6(7724)
विरूपाक्षं महावक्त्रं शङ्कुकर्णं विभीषणम्।
भीमरूपं सुताम्राक्षं तीक्ष्णदंष्ट्रं महारथम्॥ 1-169-7(7725)
महेष्वासं महावीर्यं महासत्वं महाजवम्।
महाकायं महाकालं महाग्रीवं महाभुजम्॥ 1-169-8(7726)
अमानुषं मानुषजं भीमवेगमरिन्दमम्।
पिशाचकानतीत्यान्यान्बभूवाति स मानुषान्॥ 1-169-9(7727)
बालोऽपि विक्रमं प्राप्तो मानुषेषु विशांपते।
सर्वास्त्रेषु वरो वीरः प्रकाममभवद्बली॥ 1-169-10(7728)
सद्यो हि गर्भं राक्षस्यो लभन्ते प्रसवन्ति च।
कामरूपधराश्चैव भवन्ति बहुरूपिकाः॥ 1-169-11(7729)
प्रणम्य विकचः पादावगृह्णात्स पितुस्तदा।
मातुश्च परमेष्वासस्तौ च नामास्य चक्रतुः॥ 1-169-12(7730)
घटोहास्योत्कच इति माता तं प्रत्यभाषत।
अभवत्तेन नामास्य घटोत्कच इति स्म ह॥ 1-169-13(7731)
अनुरक्तश्च तानासीत्पाण्डवान्स घटोत्कचः।
तेषां च दयितो नित्यमात्मनित्यो बभूव ह॥ 1-169-14(7732)
घटोत्कचो महाकायः पाण्डवान्पृथया सह।
अभिवाद्य यथान्यायमब्रवीच्च प्रभाष्य तान्॥ 1-169-15(7733)
किं करोम्यहमार्याणां निःशङ्कं वदतानघाः।
तं ब्रुवन्तं भैमसेनिं कुन्ती वचनमब्रवीत्॥ 1-169-16(7734)
त्वं कुरूणां कुले जातः साक्षाद्भीमसमो ह्यसि।
ज्येष्ठः पुत्रोसि पञ्चानां साहाय्यं कुरु पुत्रक॥ 1-169-17(7735)
वैशम्पायन उवाच। 1-169-18x(992)
पृथयाप्येवमुक्तस्तु प्रणम्यैव वचोऽब्रवीत्।
यथा हि रावणो लोके इन्द्रजिच्च महाबलः।
वर्ष्मवीर्यसमो लोके विशिष्टश्चाभवं नृषु॥ 1-169-18(7736)
कृत्यकाल उपस्थास्ये पितॄनिति घटोत्कचः।
आमन्त्र्य रक्षसां श्रेष्ठः प्रतस्थे चोत्तरां दिशम्॥ 1-169-19(7737)
स हि सृष्टो भगवता शक्तिहेतोर्महात्मना।
वर्णस्याप्रतिवीर्यस्य प्रतियोद्धा महारथः॥ 1-169-20(7738)
`भीम उवाच। 1-169-21x(993)
सह वासो मया जीर्णस्त्वया कमलपालिके।
पुनर्द्रक्ष्यसि राज्यस्थानित्यभाषत तां तदा॥ 1-169-21(7739)
हिडिम्बोवाच। 1-169-22x(994)
पदा मां संस्मरेः कान्त रिरंसू रहसि प्रभो।
तदा तव वशं भूय आगन्तास्म्याशु भारत॥ 1-169-22(7740)
इत्युक्त्वा सा जगामाशु भावमासज्य पाण्डवे।
हिडिम्बा समयं स्मृत्वा स्वां गतिं प्रत्यपद्यत॥ ॥ 1-169-23(7741)

इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि हिडिम्बवधपर्वणि ऊनसप्तत्युत्तरशततमोऽध्यायः॥ 169 ॥

Mahabharata - Adi Parva - Chapter Footnotes
1-169-12 विकचः केशहीनः॥ 1-169-13 घटोहं घटवद्वितर्क्यं आस्यं तदुपलक्षितं शिरः यस्य स घटोहास्यः सचासावुत्कचश्च घटोहास्योत्कचः। घटोऽहमुत्कचोऽस्मीति मातरं सोऽभ्यभाषत इति घ.ङ. पाठः॥ 13 ॥ 1-169-14 आत्मनिलः स्ववशः॥ ऊनसप्तत्युत्तरशततमोऽध्यायः॥ 169 ॥


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